
बिहार की राजनीति में आज फिर वही पुराना सीन रिपीट हुआ—स्क्रिप्ट बदली, किरदार वही! सुबह 11 बजे तक नामांकन वापसी का समय खत्म हुआ… और नतीजा? मैदान में अकेले खड़े रहे नीतीश कुमार।
ना कोई मुकाबला, ना कोई चुनौती—बस सीधा ताजपोशी का रास्ता।
अब सवाल ये नहीं कि वो अध्यक्ष बने… सवाल ये है कि क्या JDU में चुनाव हुआ या सिर्फ औपचारिकता निभाई गई?
‘निर्विरोध’ का मतलब: जीत या साइलेंट सिस्टम?
JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए सिर्फ एक नाम—नीतीश कुमार। और जब मैदान में कोई दूसरा खिलाड़ी ही नहीं, तो मैच का रिजल्ट पहले से तय ही माना जाएगा। पार्टी के राष्ट्रीय चुनाव अधिकारी अनिल हेगड़े जल्द ही उन्हें निर्विरोध अध्यक्ष घोषित करेंगे।
लेकिन इस “निर्विरोध” शब्द में जितनी सादगी दिखती है, अंदर उतनी ही गहरी राजनीति उबलती है।
राज्यसभा की चाल: दिल्ली से बिहार का कंट्रोल?
नीतीश कुमार का राज्यसभा जाने का फैसला…यही वो मोड़ था जिसने JDU के अंदर हलचल पैदा कर दी। पार्टी के अंदर फुसफुसाहट थी—
“क्या अब कमान किसी और के हाथ जाएगी?”
लेकिन आज के घटनाक्रम ने साफ कर दिया— Driver seat अभी भी Nitish के पास ही है, चाहे गाड़ी पटना में हो या दिल्ली में। 🚗
निशांत कुमार की एंट्री: राजनीति का नया चेहरा या ट्रायल रन?
बीच में खबरें आईं कि निशांत कुमार को आगे लाया जा सकता है। ईद के मौके पर गांधी मैदान में उनकी मौजूदगी…और नेताओं के साथ मीटिंग्स—सबने संकेत दिया कि कुछ बड़ा पक रहा है। लेकिन आज की तस्वीर ने बता दिया—“अभी नहीं बेटा… राजनीति का स्टीयरिंग अभी पापा के पास ही रहेगा।”
पार्टी के अंदर की चुप्पी: सहमति या रणनीति?
JDU के दिग्गज नेता—लल्लन सिंह, संजय झा—सब मौजूद रहे, लेकिन कोई विरोध नहीं। अब ये सवाल उठना लाजिमी है— क्या ये एकजुटता है या “साइलेंट एग्रीमेंट”? राजनीति में कभी-कभी चुप्पी ही सबसे तेज बयान होती है… और आज वही हुआ।

बिहार एडिटर आलोक सिंह का तीखा सटायर
“बिहार की राजनीति अब IPL नहीं रही, ये टेस्ट मैच भी नहीं… ये तो ‘नेट प्रैक्टिस’ हो गई है, जहां एक ही बल्लेबाज बार-बार क्रीज पर उतरता है और बाकी खिलाड़ी सिर्फ फील्डिंग करते हैं। JDU में लोकतंत्र की हालत ऐसी है जैसे WhatsApp ग्रुप—Admin एक ही, बाकी सिर्फ ‘Good Morning’ भेजने वाले।”
असली सवाल: JDU का भविष्य क्या?
नीतीश कुमार का दोबारा अध्यक्ष बनना कोई चौंकाने वाली बात नहीं… चौंकाने वाली बात ये है कि कोई चुनौती ही नहीं आई।
क्या ये मजबूत नेतृत्व का संकेत है? या फिर पार्टी के अंदर विकल्प खत्म हो चुके हैं? बिहार की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां चेहरे वही हैं, लेकिन समीकरण हर दिन बदल रहे हैं।
जीत से ज्यादा मैसेज बड़ा है
ये सिर्फ एक पद की जीत नहीं… ये एक मैसेज है— “JDU अभी भी Nitish-centric है।” लेकिन राजनीति की किताब में एक नियम हमेशा फिक्स रहता है— जो कहानी आज स्थिर दिखती है, वही कल सबसे बड़ा ट्विस्ट बन जाती है।
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